Tuesday, 17 May 2011

ये निद्रे मज बिलगून घे



ये निद्रे मज बिलगून घे.

तिच्या-माझ्या मिलनाची एकची जागा.

स्वप्न-नगरीच्या त्या सुंदर फ़ुलबागा.

मज प्रिये मिलन होऊ दे.

ये निद्रे मज बिलगून घे.

-------------------कवीता  -  जयेश मेस्त्रि--------------

No comments:

Post a Comment